कन्धा पर महँगाई चढ़ल देह थरथरात बा,
हई देख चीनी के ई केतना भाव खात बा।
खउलत बाटे दूध ओमें चाउर के तूँ देखs,
लागे जईसे उहो चीनी बिन छटपटात बा।
होते फीका जायका फीका भईल जुबान,
बेचैनी में बिन चीनी के चाय उबलात बा।
बिलखेला दुःख से हलुवाई के कड़ाही में,
चढ़त भाव से मिठाई के माथा चकरात बा।
सहम गईल अब सुनिके सगरो हाला से,
बनी चासनी कईसे मुरब्बा भी डेरात बा।
गर्मी से व्याकुल मानव लागी जब हाँफे,
कईसे के तैयार होखब शर्बत शर्मात बा।
बनली चीनी रानी रहीहें कईसे रसोई में,
तेज मूल्य से ‘यश’ घरवाली घबरात बा।