पुरवइया
भोजपुरी साहित्य

गाँवे देखीं शहर बा आइल

मुकेश यादव "भावुक"
28 सितम्बर 2026 · 11:17 अपराह्न IST

जब-जब नियरा घर बा आइल,
तब-तब मन में डर बा आइल।

जेब फटल बा, मुँह गिरल बा,
गाँवे देखीं शहर बा आइल।

सुख भइल बा काँटा जइसन,
लेके बगली जहर बा आइल।

रात अमावस कइसो कटल,
भोर अँजोरिया दुपहर बा आइल।

इहवों त लोग पराया कइलसि,
होके ऊ दर-बदर बा आइल।

घड़ा कर्ज के मूड़ी पर अइसन,
हाथे माटी मुट्ठी भर बा आइल।

झूठे का गवाईं, जान ए ‘भावुक’,
आँखिन में पीर लहर बा आइल।

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