कई दिन तक बरसल बदरी,
धानवा गिरल मेड़ के कगरी।
भूख-पियास कुल गइल हेराइ,
जर-जजात डूबल बा सगरी।
बंद भइल अब लोर आखिन से,
कइसे ओकर हालात सम्हरी।
बांझ परल किस्मत के रेखा,
उठी कइसे किसान के पगरी।
हे ईश्वर! तनी दया करीं,
डगरे दीं जीवन के डगरी।
आस रहे कि करजा उतरी,
मुश्किल भइल चलल अब डहरी।
“भावुक” मन ना लागे कतहीं,
गइल नया बिपत बा ऊपरी।