ई बात हवा के खल रहल बा,
कि काहे दीया जल रहल बा।
रात अँहरिया साज़िश कईलस,
तबहूँ सूरज निकल रहल बा।
दुश्मन से हम बचत रह गइनी,
अपनहीं लोगवा छल रहल बा।
गिरगिट त बदनाम बा खाली,
आदमी ज़्यादा बदल रहल बा।
दोष हम काहे काँटा के दीं,
फूल ही पाँव में हल रहल बा।
अब अपने घर के बात “नूरैन”,
दोसरा से पता चल रहल बा।




