कौन जीता यहाँ और हारा है कौन?
किसने किसको लहू में उतारा है मौन?
सभ्यताएँ खड़ीं आज खामोश हैं,
सड़कों पे बिखरा हुआ होश है।
जश्न अपनी ही जीत का गाएँगे वो,
हार को जीत अपनी बताएँगे वो।
मसले जो असल थे वो सब खो गए,
हाकिम भी सच से जुदा हो गए।
कब पूछेगी जनता ये उनसे भला,
उफनता सवाल अब जो दिल में जला?
बस्तियाँ राख हैं, ख़्वाब मलबे में है,
फ़ैसले सब यहाँ बंद कमरों में हैं।
वो जो सरहद पे सर को कटा कर गिरे,
नाम उनके महज़ अब तो ख़बरों में हैं।
कुर्सियाँ ही यहाँ बस सलामत रहीं,
चीख मासूम बच्चों की आफ़त रही।
बोया नफ़रत का बीज और काटी फ़सल,
क्या सियासत की यही बस इबादत रही?
देख लो आज इंसानियत हार गई,
स्वार्थ की भूख दुनिया को मार गई।
