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हिंदी साहित्य

कहीं चूल्हे पे अदहन खौलता है-चेतना पाण्डेय

कवयित्री बताती हैं कि खुशियाँ और राहत सबको बराबर नहीं मिलतीं, और जब दिल बुझा हुआ हो तो सावन जैसी ऋतु भी भीतर बेचैनी पैदा कर देती है

चेतना पाण्डेय
17 जनवरी 2026 · 12:51 अपराह्न IST

कहीं चूल्हे पे अदहन खौलता है
कहीं बेबस कोई मन खौलता है

फुहारें सबके हिस्से में कहां हैं
बुझा हो दिल तो सावन खौलता है

लगें जब कानाफूसी करने कमरे
तो फिर उकता के आँगन खौलता है

जो पागल ढूंढते रंगों में मज़हब
उन्हें देखे तो फागुन खौलता है

किसी को कैद,आजादी किसी को
सज़ा कैसी है, बन्धन खौलता है

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