सब एहीजे मिली
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मोर बाल बच्चा खूबे सुनर,
ई घमंड रूप के पाली मत।
दोसरा के करिया नकभेभर,
मीन मेख अनका काढ़ी मत।।
सुनरको जाइ बउरको जाइ,
बिधना के लेख बुझाई कब।
धरम करम तनी राखी निमन,
ताकि गईला पर गुन गाई सब।।
रहत होखऽ तू महल अटारी,
चाहें टूटल झोपड़ पट्टी लघु।
आइल बा जे ऊ जइबे करी,
के विधि लेखा के टारी ‘रघु’।।
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रात अन्हरिया भा अंजोरिया,
हो बसंत या दिन पानी बुनी।
छोड़ देह चल जाइ बहरिया,
अमर आत्मा के सब कहानी सुनी।।
छोड़ऽ घमंड रूपया पइसा के,
सोना नियन महल अटारी के।
ए मनई रहऽ बना व्यवहार के,
ना त उड़त परान देह जारी के।।
बाउर दिन भी बनत मिली,
बनल दिन होत बाउर मिली।
जइसन करबऽ ओइसन मिली,
सरग नरक सब एहीजे मिली।।
✍️राघवेंद्र प्रकाश ‘रघु’
ब्रह्मपुर, बक्सर (बिहार)