Purvaiya Purvaiya
Sign in
सब कुछ रचनाकार वीडियो ई-पत्रिका कविता भोजपुरी कहानी भोजपुरी गीत भोजपुरी सनीमा भोजपुरी साहित्य मुक्तक व्यंग्य हिंदी साहित्य ग़ज़ल
Home Authors Dictionary Videos
लोकप्रिय रचनाकार
मुकेश यादव "भावुक" 2.9K
शम्स जमील 2.8K
राघवेंद्र प्रकाश 'रघु' 1.7K
नूरैन अंसारी 1.7K
मनोज भावुक 753

ट्रेंडिंग (Trending)

अब तक की सबसे लोकप्रिय रचनाएं

सब समय आज इस सप्ताह
सब कुछ साहित्य गीत-ग़ज़ल कहानियां
1

बतिया केहू के खल जाला-शम्श जमील

शम्स जमील
1.6K पाठक • 5 महीना पहिले
जब कोई अपने प्यार या अपनापन भरी बातें करता है, तो अक्सर किसी न किसी के मन में जलन (इरखा) पैदा हो जाती है।
2

मन धधाइल गावें गइनी-ग़ज़ब के वायरल कविता,बिना पढ़े मत जाइए

मुकेश यादव "भावुक"
746 पाठक • 4 महीना पहिले
जब छूटल हास्य के व्यंग आ जुटल बढ़न महफिल, त जागल हास्य के रंग
3

चाहे गमछा फार के रहअ

जमील मिर
694 पाठक • 4 महीना पहिले
चाहे गमछा फार के रहअ। चाहे तु झार के रहअ।। दिल मे अपने मुहब्बत के दिया एगो बार के रहअ।। ना प्यार ना बैर से ना आपन ना गैर से…
4

“बुढ़िया” भोजपुरी कहानी – राघवेन्द्र प्रकाश रघु

राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'
616 पाठक • 3 महीना पहिले
दू-चार दिन से बड़ा मन चिड़चिड़ाइल रहत रहे, तनी पाकिट ढीला हो गइल रहे से।सुबह-सुबह दरवाजा केहूँ पीटलस… जा के खोलनी त माई दरवाजा पर खड़ा रहस। गोड़ लगनी त…
5

पईसा…. राघवेन्द्र प्रकाश “रघु”

राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'
548 पाठक • 5 महीना पहिले
पईसा बिना लोग देखअ,एक देने तड़पे।खाए के ना अन्न दाना,जीव देखअ डहके।। पईसा बा त लोग कइसे,पउवा पखारेला।नहाईला के बाद चढ़ी,धोतियों खंगारेला।। साच कही नईखे पईसा,अपनो खदेड़ेला।भुला के सब रिश्ता-धरम,सहियो…
6

मुह पर माहुर रखला मे शान का बाटे | नूरैन अंसारी

नूरैन अंसारी
498 पाठक • 5 महीना पहिले
7

चोट खा-खा के जिनिगी – कुमार अजय सिंह

कुमार अजय सिंह
472 पाठक • 3 महीना पहिले
चोट खा-खा के जिनिगी, ई घाही बनललागल भगिया में अगिया, तबाही बनल घाव बड़हन भइलऽ, ऊ नाऽ जल्दी भरीजे डुबवलस ऊ मौका पर, हाथ का धरीऊ चिन्हलके आदमिया बा, डाही…
8

भोजपुरी में बात करीं, वायरल रचनाकर के कइसन निहोरा?

शम्स जमील
467 पाठक • 4 महीना पहिले
वायरल कवि शम्स जमील के रचना वायरल हो रहल बा, त आईं देखि जा उहाँ के का कहल चाहत बानी।
9

मन धधाइल गावें अइनी, वायरल कविता मे आखिर क्या है ?

मुकेश यादव "भावुक"
466 पाठक • 3 महीना पहिले
10

मिलित अगर सभे के बिहार में ही रोज़गार-ताजुद्दीन अंसारी

ताजुद्दीन अंसारी
455 पाठक • 5 महीना पहिले
छोड़े के ना परित कबहूं आपन घर दुआर।मिलित अगर सभे के बिहार में ही रोज़गार। अपनन से बिछड़े के कबो दरद ना होइत।बीवी-बचवन के याद कर के दिल ना रोइत।आपन…
11

हमहि से प्रेम, हमहि से छुपावे के बा

मुकेश यादव "भावुक"
420 पाठक • 5 महीना पहिले
उसका मक़सद ही शायद मुझे तड़पाना है, क्योंकि उसके व्यवहार में दर्द ज़्यादा और अपनापन कम महसूस होता है। वो प्यार भी मुझसे ही करता है, और उसी प्यार को…
12

एक रूपिया के कीमत के कहानी

रिशु कुमार गुप्ता
383 पाठक • 4 महीना पहिले
जइसे गरमी में दिवाकर के,आ सस्ती में टमाटर के जइसे बिना धार के फरसा के,आ बिन मौसम के बरसा के जइसे बिना भुख के भात के,आ मेहंदी लागल हाथ के…
13

कहीं चूल्हे पे अदहन खौलता है-चेतना पाण्डेय

चेतना पाण्डेय
380 पाठक • 3 महीना पहिले
कवयित्री बताती हैं कि खुशियाँ और राहत सबको बराबर नहीं मिलतीं, और जब दिल बुझा हुआ हो तो सावन जैसी ऋतु भी भीतर बेचैनी पैदा कर देती है
14

नामी आदमी के साजिशन बदनाम कइलन स – मनोज भावुक

मनोज भावुक
369 पाठक • 5 महीना पहिले
15

ए शीतलहरी काकी-डॉo यशवन्त केशोपुरी

डॉo यशवन्त केशोपुरी
360 पाठक • 3 महीना पहिले
यह ठंड सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि मनुष्य की असहायता और प्रकृति की कठोरता का प्रतीक बन गई है। लोग राहत और शरण की तलाश में हैं, लेकिन शीतलहरी निर्दय होकर…
16

कबले खइहन मार बिहारी | Noorain Anasri

नूरैन अंसारी
350 पाठक • 5 महीना पहिले
17

मितवा जबसे गांव हम छोड़नी-मुकेश यादव

मुकेश यादव "भावुक"
345 पाठक • 5 महीना पहिले
जबसे अपना गाँव, अपना घर-आँगन, अपना बचपन और अपनापन छोड़कर बाहर निकले हैं, तबसे किस्मत जैसे रूठ गई है। ना पहले जैसी खुशियाँ हैं, ना वो सुकून, ना वो अपनापन।
18

मन काहें अकुताइल बा

मुकेश यादव "भावुक"
333 पाठक • 5 महीना पहिले
भीतरे भीतर घवाहिल बा,बात समझ मे आइल बानेह वेह से सब दूर भइलमन काहें अकुताइल बा। चोरन के अब ज़ोर भइल,भीतरे भीतर शोर भइल,मुह गिरा के बइठल बाड़,का मन के…
19

कसक जीवन के…मन कबों थोर ना रहे

सुजीत पाण्डेय
321 पाठक • 4 महीना पहिले
सुजीत पाण्डेय बक्सर
20

हम पीर आपन बतलाई केसे-तबारक अंसारी

तबारक अंसारी
305 पाठक • 5 महीना पहिले
21

अपने लोग अब पराया हो गइल

मुकेश यादव "भावुक"
279 पाठक • 1 दिन पहिले
अपने लोग अब पराया हो गइल। गांव से बरगद के सफाया हो गइल। मेल-जोल अब धतूरा सन जहरीला भइल, आम-अमरुद के स्वाद पुराना हो गइल। चिउंटी के चीनी खियावे वाला…
22

आदमी अब बेचारा बन गइल बा-रिशु कुमार गुप्ता

रिशु कुमार गुप्ता
278 पाठक • 5 महीना पहिले
मोबाइल फोन, जो कभी सिर्फ ज़रूरत की चीज़ था, आज इंसानों की ज़िंदगी पर हावी हो गया है। इंसान खुद सोचने-समझने वाला जीव था, लेकिन अब मोबाइल पर निर्भर होकर…
23

जिनिगिया ई अबले अन्हारे में बीतल-श्रद्धानन्द पाण्डेय

श्रद्धानंद पाण्डेय
268 पाठक • 3 महीना पहिले
हमेशा रहल नेह दियना बुताइल,जिनिगिया ई अबले अन्हारे में बीतल। हिया में रहल पीर अँखियनि में पानी,न जियरा के केहू सकल सुनि कहानी,न ओठनि प आइल कबो बात मन में,जिनिगिया…
24

बेरोजगारी कवनों मुद्दा नईखे-शम्स

शम्स जमील
268 पाठक • 5 महीना पहिले
25

हम का करीं, बुझाते नइखे-नूरैन अन्सारी

नूरैन अंसारी
256 पाठक • 5 महीना पहिले
हम का करीं, बुझाते नइखे. दुःख मुसीबत, जाते नइखे. दोसरा के छोड़ीं महाराज, आपन तऽ, सम्हराते नइखे. खेती कइनी नोकरी कइनी, कही कुछउ, पोसाते नइखे. हाल बताई हम केकरा से,…
26

हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी-हीरा डोम

हीरा डोम
241 पाठक • 3 महीना पहिले
यह कविता महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ (सितंबर 1914, भाग 15, खंड 2, पृष्ठ संख्या 512-513) में प्रकाशित हुई थी।
27

केकरा चिंता बाटे ए भइया, असल मे एगो बिहारी के

शम्स जमील
225 पाठक • 2 सप्ताह पहिले
कुल्हत मुसमात महतारी केसमाज के अपना नारी केकेकरा चिंता बाटे ए भइयाअसल मे एगो बिहारी के आवता जे भी खाता उहेबाड़ेन असली दाता उहेका कहीं सरकार के जीसवत आपन बुझाता…
28

याद त अइबे करी घरी-घरी

राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'
173 पाठक • 1 सप्ताह पहिले
याद त अइबे करी घरी-घरी,रिश्ता उ अलगे उफान पर रहल।नज़र लागल कवने मुदइया के रामा,बहल नयनन नीर जइसे बरखा रहल। पिरितिया हम तोहसे लगवले रहीं,सखी-सहेली में चर्चा कइले रहीं।बनबऽ तुही…
29

एक दिन बाद भेंट होइ, नाही केहू अब लेट होइ

शम्स जमील
168 पाठक • 2 सप्ताह पहिले
एक दिन बाद भेंट होईनाही केहू अब लेट होईकविता गीत गज़ल सेमंच ई काल्ह सेट होई भोजपुरी मे राखता जेनवहा लोगन के ठेल केअबकी बेर सुने के मिलीभइया संतोष पटेल…
30

ई बात हवा के खल रहल बा

नूरैन अंसारी
161 पाठक • 2 सप्ताह पहिले
ई बात हवा के खल रहल बा,कि काहे दीया जल रहल बा। रात अँहरिया साज़िश कईलस,तबहूँ सूरज निकल रहल बा। दुश्मन से हम बचत रह गइनी,अपनहीं लोगवा छल रहल बा।…
About Copyright Contact us Creators Advertise
Purvaiya

© 2026 The Digiway Media

होम वीडियो
रचनाकार
शब्द-कोश अकाउंट