बस्तियाँ राख हैं, ख़्वाब मलबे में है

मुकेश यादव "भावुक"
2 Subscribers
Subscribe
239 Views • अप्रैल 9, 2026

कौन जीता यहाँ और हारा है कौन?
किसने किसको लहू में उतारा है मौन?

​सभ्यताएँ खड़ीं आज खामोश हैं,
सड़कों पे बिखरा हुआ होश है।

​जश्न अपनी ही जीत का गाएँगे वो,
हार को जीत अपनी बताएँगे वो।

​मसले जो असल थे वो सब खो गए,
हाकिम भी सच से जुदा हो गए।

​कब पूछेगी जनता ये उनसे भला,
उफनता सवाल अब जो दिल में जला?

बस्तियाँ राख हैं, ख़्वाब मलबे में है,
फ़ैसले सब यहाँ बंद कमरों में हैं।

​वो जो सरहद पे सर को कटा कर गिरे,
नाम उनके महज़ अब तो ख़बरों में हैं।

​कुर्सियाँ ही यहाँ बस सलामत रहीं,
चीख मासूम बच्चों की आफ़त रही।

​बोया नफ़रत का बीज और काटी फ़सल,
क्या सियासत की यही बस इबादत रही?

​देख लो आज इंसानियत हार गई,
स्वार्थ की भूख दुनिया को मार गई।

कठिन शब्द अउर अर्थ