हमहि से प्रेम, हमहि से छुपावे के बा

मुकेश यादव "भावुक"

30 नवम्बर, 2025

उनुकर इरादा हमके सतावे के बा,
हमहीं से प्रेम, हमहीं से छुपावे के बा।

कब ले देखब छुप-छुप के चाँद के,
अब चाँद के ही जमीन पर बुलावे के बा।

रोम-रोम में एगो अलगे नशा चढ़ल बा,
इहे खुशबू अब दुनिया में महकावे के बा।

प्रेम के वासना मत बुझीं, ए भाई,
ई बात अब मजनुवन के समझावे के बा।

मोबाइल आ इंटरनेट के एह दौर में भी,
कवनो कबूतर से चिट्ठी पहुँचावे के बा।

मन बना लीं त मंजिल दूर कहाँ बा,
सात समंदर पार भी घर बनावे के बा।

‘भावुक’, जब-जब उनकर याद सताई,
लौट के, एक ना एक दिन त आवे के बा।

#Mukesh Bhawuk

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मुकेश यादव "भावुक"

पेशेवर सिविल इंजिनियर नई दिल्ली

"मुकेश यादव 'भावुक' भोजपुरी के उभरत रचनाकार बाड़ें. इहां के गीत/ग़ज़ल मे आम जनमानस के आवाज़ होला."

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