धूप चटके त अमृत के निसानी चाहीं

गणेश नाथ तिवारी "विनायक"

14 अप्रैल, 2026

धूप चटके त अमृत के निसानी चाहीं,
सोन्ह घइला के ओही में पानी चाहीं।

​जवन मिसरी घोल देला मन के भीतर,
ओही सतुआ के सानल कहानी चाहीं।

​मेटावे घाम के तीताई जलन देहि से,
पिपरा के छाँव अस एगो जवानी चाहीं।

​चना,जव मकई के सुनर महक आवेला
ओपर नून,मिर्चा टिकोरा छानी चाहीं।

मिटे कंठ के तरास जव-बूट के सतुआ से,
अपना गाँव के किसान के मेहरबानी चाहीं।

​जेकरा पवला से पुरखा के याद आवेला
‘बिनायक’ आज ओइसन रूहानी चाहीं।

गणेश नाथ तिवारी”विनायक”

कठिन शब्द अउर अर्थ

  • सोन्ह: सोंधी मिट्टी।
  • नाथ: नाक की रस्सी।
  • घाम: कड़ा धूप के घाम कहल जाला।

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गणेश नाथ तिवारी "विनायक"

संस्थापक-जय भोजपुरी जय भोजपुरिया, सह सम्पादक- सिरिजन भोजपुरी तिमाही ई पत्रिका श्रीकरपुर,सिवान

"वर्तमान पता-3,प्रिन्सेप लेन कोलकाता शिक्षा - स्नातक मो0 9523825251 (सऊदी अरब में मेकेनिकल टेक्नीशियन के रूप में नोकरी 2011 से 2024 तक )"

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