याद त अइबे करी घरी-घरी

राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'

14 अप्रैल, 2026

याद त अइबे करी घरी-घरी,
रिश्ता उ अलगे उफान पर रहल।
नज़र लागल कवने मुदइया के रामा,
बहल नयनन नीर जइसे बरखा रहल।

पिरितिया हम तोहसे लगवले रहीं,
सखी-सहेली में चर्चा कइले रहीं।
बनबऽ तुही मोर राजा ए ‘रघु’,
धीरे से काने माई के बतवले रहीं।

करे के रहल लमहर बात तोहसे,
उ बात अब तक अधूरा रह गइल।
नादान मन सोचले रहल बनी कहानी,
उ बतिया भी आज अधूरा रह गइल।

हाथ रखऽ अपना करेजा पर कबो,
सोचिहऽ कि केकरा में गलती रहल।
सोचिहऽ एहु बात के ए राजा कबो,
काहे हमनी के पेयार अधूरा रह गइल।

एतना पेयार तोहसे हम कइले रहीं,
कबो दोसरा के ना हम सोचले रहीं।
सफर जिनगी कतहीं मिलिहऽ अगर,
देख के अनदेखा ना करिहऽ कहीं।

बात मनले जे रहतऽ हमरों कभी,
कटत जिनगी राजा तोहरे संगे कहीं।
जहाँ रहऽ आबाद रहऽ तू हसीं ख़ुशी,
टूटल करेजवा से भी हरदम दुआ रही।

कठिन शब्द अउर अर्थ

  • बरखा: बारिश।
  • माई: माता।
  • लमहर: लंबा।
  • जिनगी: जिंदगी।

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राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'

कलमकार अउर नोकरी बक्सर

"राघवेन्द्र प्रकाश 'रघु' बिहार के बक्सर जिला के ब्रह्मपुर गाँव के रहे वाला बानी। इहाँ के भोजपुरी आ हिंदी मे रचना रचत रहेनी। इहाँ के शिक्षा स्नातकोत्तर (क़ृषि) टी.डी. कॉलेज जौनपुर, उत्तर प्रदेश से प्राप्त करले बानी। साहित्य प्रेमी के साथ वर्तमान में क़ृषि विभाग, बिहार सरकार में एगो कर्मचारी बानी।"

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