खेदारू के बिआह

प्रकाशित: 07 Apr, 2026
ई चित्र AI से बनावल गइल बा

खेदारू के बिआह फूला संघे बड़ी धूमधाम से भइल। बिदाई के बेरा फूला के माई-बाप, भाई-भउजाई, चाचा-चाची सभे उदास रहे। फूला के सखी चमेलियो कम उदास ना रहली, बाकिर केहू का करित, बेटी के त एक दिन बहुरिया बनहिं के परेला। फूला के अकवारी में भर के चमेली एतना लोर बहवली कि भादवो सरमा गइल। भदवारी में त बरखा के बाद आसमान साफ हो जाला, बाकिर चमेली के आँखियन से ना बरखा ओरात रहे ना बादर।

बिदाई भइल, नवसे आ उनके घर के सभे बहुत निहाल रहे। येने कार में बहुरिया के साथे नवसे प्रेम रस में नहात रहलन, त ओने घर के मेहरारू समाज बहुरिया के इन्तजार में नाचत गावत रहे। बाकिर भगवान जी के मरज़ी के का कहल जा! ऊहाँ के त कुछ अउरिए मंजूर रहे!

बड़ी जोर आन्ही आइल, सड़क के दूनू बगल रहे बड़े बड़े पेड़, बीचे बीचे निकसत रहे बरातिन के काफिला। अचानक एगो पेड़ गिरल, टेक्सी में बइठल खेदारू के बाबू जी घाही हो गइलन। अब का होखो सभे उनके ले के अस्पताल पहुँचल। डाक्टर कहलन कि “गहीर चोट लागल बा, आपरेशन करे के पड़ी कम से कम पचास हजार के इन्तजाम करीं लोगिन।”

घरे त फूटल कउड़ी ना रहे, कहाँ से आइत पचास हजार! बड़ी घावला के बाद नेउर सेठ बियाज पर रूपया देबे के तइयार हो गइलन। शंकर के चीर-फार, दवा-दारू भइल, कुछ दिन में ऊ त ठीक हो गइलन। बाकिर पचास हजार के करजा कवनो रोग से कम त ना रहे।

खेदारू बेचारू का करतें! किरिया खा लिहलन कि “जबले हम करजा ना चुकाइब, अपना मेहरारू से देहिं ना छुआइब।”

खेदारू कमाये दिल्ली जात रहलन, उनकर मेहरारू बहुते उदास रहली। करिया बादर घेरले होखे, धान पानी बिन सूखत होखे, आन्ही आवे आ बादर उधिआ जा, बुनियो ना परे त डरेरा पर आस में बइठल किसान के जइसल बुझाला—कुछ अइसने हालत फूला के हो गइल। उनकी अँखियन से लोर झरे लागल।

खेदारू के जाते फूला के रोज ताना मिले लागल—“ये कुलच्छनी के आवते घर भिला गइल। ई मरियो जाइत त करेजा जुड़ाइत।” अउरियो का जाने कवन-कवन ताना सुत-उठ के मिले, बाकिर फूला सब कुछ चुपचाप सहत रहली।

खेदारू वैल्डिंग के काम सीख लीहले रहलन। महीना में दस-एगारे हजार बनिये जात रहे, हर महीना एक-दू हजार भेजियो देत रहलन। एही तरह तीन साल बीत गइल।

खेदारू कुछ पइसा जमा कर लिहलन। सोचलन—“अब घरे चले के चाहीं। फूला हमके देख के कितना खुश होई!”

भिनसारे ट्रेन पकड़ लिहलन। रास्ता में एगो आदमी से दोस्ती हो गइल। बात-चीत भइल।

“खइनी खइब?”

“खा लीं।”

खइनी में नशा मिलावल रहे। खेदारू बेहोश हो गइलन। ओ आदमी अटैची बदल के उतर गइल।

जब होश आइल, खेदारू के कुछ समझ ना पड़ल। घर पहुँच के अटैची खोललन—त ओह में किताब-कॉपी रहे, पैसा गायब!

सेठ तगादा करे आ गइल—“अब त पैसा दे द!”

खेदारू समझ गइलन कि अटैची बदल गइल बा।

एही बीच उ आदमी (मोहन) के घर में ओकर मेहरारू चमेली अटैची खोल के देखली त लाखन रुपया आ फूला के फोटो मिलल। ऊ चिहा गइल—“अरे! ई त हमार सखी के अटैची ह!”

चमेली मोहन से कहलस—“ई पाप के कमाई बा। चल, लौटा के आ।”

मोहन पहिले हिचकिचाइल, बाकिर आखिर मान गइल।

दूनो जन अटैची ले के खेदारू के घर पहुँचलन।

खेदारू परेशान बइठल रहलन। जब मोहन अटैची लौटा दिहलस त उनका आँख में खुशी के आँसू आ गइल।

खेदारू तुरंत सेठ के सारा पैसा चुका दिहलन।

तीन साल के करजा उतर गइल।

अब खेदारू फूला के ओर देखलन… धीरे से ओकर गाल पर चिकोटी काट दिहलन। फूला लजा गइल। घर में हँसी गूँज उठल।

तीन साल के दूरी आज खत्म हो गइल।

कठिन शब्द अउर अर्थ

  • बरखा: बारिश।
  • फार: हल।
  • माई: माता।
  • चिकोटी: चुटकी।
  • जात: अनाज पीसे वाला पत्थर के चक्की। (प्रयोग: जांत के पीसल आटा बहुत निमन लागेला।)

आकाश महेशपुरी

होम रचनाकार वीडियो शब्द-कोश पत्रिका