अपने लोग अब पराया हो गइल

मुकेश यादव

23 अप्रैल, 2026

अपने लोग अब पराया हो गइल।
गांव से बरगद के सफाया हो गइल।

मेल-जोल अब धतूरा सन जहरीला भइल,
आम-अमरुद के स्वाद पुराना हो गइल।

चिउंटी के चीनी खियावे वाला लोग कहाँ गइल,
अब त आदमी, आदमी के ही निशाना हो गइल।

डीह बाबा के चउरा पर बैठकी के रिवाज हेराइल,
जब से हर आँगन मे मोबाईल के जमाना हो गइल.

सच कहे वाला के अब के सुनत बा एहिजा,
झूठ के बाजीगर ही सबसे सेयाना हो गइल.

खेत खलिहान छोड़ शहर भागे लागल सब,
माटी से रिश्ता भी अब बेगाना हो गइल.

के सुनी अब झूमर, झारी, चइता, बिरहा, कजरी,
“भावुक” के बोली अब बस फसाना हो गइल।

कठिन शब्द अउर अर्थ

  • हेराइल: खो जाना।

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

मुकेश यादव

पेशेवर सिविल इंजिनियर नई दिल्ली

"मुकेश यादव 'भावुक' भोजपुरी के उभरत रचनाकार बाड़ें. इहां के गीत/ग़ज़ल मे आम जनमानस के आवाज़ होला."

Maati Kavi Sammelan
होम रचनाकार वीडियो शब्द-कोश अकाउंट