बाबा साहेब के तू करिहऽ, गुणगान बबुआ

संतोष विश्वकर्मा 'सूर्य'

14 अप्रैल, 2026

बाबा साहेब के तू करिहऽ, गुणगान बबुआ।
जे बनावल एही देश के, संविधान बबुआ।

बिखरल रहे समाज घिनौना, छुआछूत की आन्ही में।
जाति-व्यवस्था जहर घोरि दिहले रहे पानी-पानी में।
ऐही सभ्य समाज में मानव से पशुवत व्यवहार भइल।
अत्याचार बढ़ल एतना की मानवता भी हार गइल।

इहवां समझे ना केहू हमनी के, इंसान बबुआ।
बाबा साहेब के तू करिहऽ, गुणगान बबुआ।

जे हमनी के आरक्षण के, फौलादी हथियार दिहल।
शक्तिशाली संविधान के , जे सुंदर उपहार दिहल।
जे समाज खातिर जीवनभर, दुनिया से संघर्ष कइल।
उनका चलते आज हई सपना, सगरो साकार भइल।

दिहल उनकर हउवे होठे पर मुस्कान बबुआ।
बाबा साहेब के तू कइ लऽ, गुणगान बबुआ।

सत्ता शिक्षा पर समान अधिकार, दियावल उनकर हऽ।
दलित और शोषित गरदन में, हार दियावल उनकर हऽ।
जे आवाज बनल हमनी के, सड़क से ले के संसद तक,
हमरा तहरा खातिर ई संसार, दियावल उनकर हऽ।

जेकरा आगे शीश झुकावे ला, जहान बबुआ।
बाबा साहेब के तू करिहऽ, गुणगान बबुआ।

कठिन शब्द अउर अर्थ

  • जात: अनाज पीसे वाला पत्थर के चक्की। (प्रयोग: जांत के पीसल आटा बहुत निमन लागेला।)

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संतोष विश्वकर्मा 'सूर्य'

लोको पायलट गोरखपुर
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