लरिकाईं में हमहुँ एगो, रोबोट बनवले रहनी,
ओकरे आगे हम अपना के, छोट बनवले रहनी।
आठ पहर उ राखत रहे, अपना आँखि के सोझा,
हरदम कोरा टांगि के राखे, ना बुझलस उ बोझा।
ममता छोह लुटावे अउरी, पुचकारे दुलरावे,
जब हमरा के भूख लागे, उ आपन दूध पियावे।
हरदम अपना कोरा ले के, संघहि अपना राखे,
उ हमरा कुशलाई खातिर, दर दर भारा भाखे।
बिनु कहले सब जाने बुझे, हमरा देह के भाषा,
बिनु स्वार्थ सब करे कवनो ना रखलस उ आशा।
अनजाने में कबहुँ जे बिस्तर पर झाड़ा फिरीं,
रोबोट नु रहे! तब उ दउरल आवे हमरा भिरीं।
धोवे पोंछे नहवावे आ देहि में तेल लगावे
मिसे गोड़ आ देह दबावे हमरो थाक भगावें।
आँखि में हमरा काजर करें माथे लगावे टीका,
टोना नजर ना लागे देवे ओकर इहे तरीका।
रखले रहे मामा एगो आसमान के जाके,
दुध आ भात खियावत रहे चंदा रोज बोला के।
अपने गोदी राखे हमके अपने पास सुतावे,
आजा नींनिया रानी कहके लोरी रोज सुनावें।
आंचर ओकर ओढ़ना हमरो आंचर रहे बिछवना,
सोंचिले के ओइसन सुख अब मिली जगहा कवना?
कवनो बात के फिकिर ना रहे, सब कुछ उहे करें,
नेटा पोंटा गुह मुत से ,ओकर जीव ना भरे।
गंड़तर भगई फिंचत फिंचत कहियो ना अगुताइल,
जब जब हमरा ओरी देखलस खुश भइल मुस्काइल।
खुशी के ओकरा पार ना रहे जब हमरा के देखे,
रामसागर कलम सियाही से हम लिखीं कवना लेखे।
कुछ बड़ हम भइनी हमहुं कइनी कुछ चतुराई,
खुश होई के हमहीं ओकर नाम ध दिहनी माई!
✍🏻: Ramsagar Singh
M: 8156077577
